BJP का दलित कार्ड, रामनाथ कोविंद को आगे कर मोदी ने फिर चौंकाया

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असल निशाना कहीं और है

राष्ट्रपति पद के लिए जितने नामों पर पिछले कुछ महीनों से माथापच्ची चल रही थी, उनसे इतर एक नाम देकर मोदी ने एकबार फिर लोगों को चौंका दिया है और यह नाम है बिहार के राज्यपाल और भारतीय जनता पार्टी के नेता रामनाथ कोविंद का.
मोदी दरअसल, इससे भी आगे देख और सोच रहे हैं. उनकी निगाह राजनीति की संख्याओं पर है और संख्याओं के खेल में जो बहुमत आबादी भाजपा के साथ खड़ी होने से बचती रही है, उसे लुभाने की दिशा में यह एक बहुत बड़ा तुरुप का कार्ड साबित होगा.
भारत में अभी तक केवल एक दलित राष्ट्रपति हुए हैं, केआर नारायणन. लेकिन वो दक्षिण से आते थे और उत्तर की राजनीति में उनका दखल और प्रभाव न के बराबर रहा है. ऐसे में यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि अगर कोविंद राष्ट्रपति बन जाते हैं तो उत्तर भारत से पहली बार कोई दलित देश का राष्ट्रपति बनेगा.
कोविंद उत्तर प्रदेश से आते हैं. बहुत कम लोग जानते हैं कि कोविंद आरक्षण बचाओ आंदोलन जैसे सामाजिक प्रयास भी कर चुके हैं. उनकी यह बात अगड़ों की आरक्षण विरोधी अवधारणा के खिलाफ दलितों के हित का एक उदाहरण पेश करती है. यह उदाहरण तब काम आएगा जब दलित राजनीति रटी-रटाई लाइन दोहराएगी कि भाजपा आरक्षण विरोधी है और आरक्षण खत्म कर देगी.
मायावती ने पांच सालों में जिस तरह अपनी ज़मीन खोई है, वहां भाजपा की ओर से रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति बनाने की कोशिश एक मज़बूत दखल है और इस संदेश को दलितों के घर-घर तक ले जाने में भाजपा कोई कसर भी नहीं छोड़ेगी.
गुजरात में दलितों के बीच भी एक अच्छा संदेश मोदी यहां से भेज रहे हैं. दलितों और आदिवासियों ने मोदी को पिछले दो दशकों से गुजरात में जिताया है. पर पिछले कुछ समय से उनके बीच असंतोष बढ़ा है. मोदी गुजरात में भी गैर-पाटीदार वोटों को साधने के लिए एक संदेश इसबार के राष्ट्रपति चुनाव के माध्यम से दे ही रहे हैं.
दूसरी बात यह है कि भाजपा की दलित विरोधी छवि को पिछले तीन बरसों के दौरान उत्पीड़न और दलितों की हत्याओं के मामलों ने और हवा दी है. जनरल वीके सिंह की टिप्पणी हो, मामला रोहित वेमूला की आत्महत्या का रहा हो, ऊना के दलितों की पिटाई का या फिर सहारनपुर में घिरने का, मोदी के लिए बहुत आवश्यक है कि भाजपा लगातार बनती दलित विरोधी धारणा को तोड़ें.

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