सावित्री बाई फूले

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 सावित्रीबाई फुले देश की वह महानायिका है जिन्होंने स्त्रियों केा अधिकारों  व शिक्षा के लिए अपना सम्पूर्ण जीवन
 समर्पित कर दिया सावित्रीबाई भारत के प्रथम महिला शिक्षिका थी उनका जन्म सन 1831 में हुआ इनके पिता का नाम खंदोजी नेवसे और माता का नाम लक्ष्मी था सावित्री बाई का बचपन से ही पड़ने लिखने का मन था परन्तु उनके पिताजी लड़कियों की शिक्षा के विरुद्ध थे क्योकि उस समय स्त्रियों को केवल घर के कार्य व पुरुष सेवा तक ही सीमित रखा जाता था सावित्रीबाई फूले का विवाह सन 1840 में ज्योतिबा फूले से हुआ था चूँकि ज्योतिबा फूले ने स्वय सावित्रीबाई फूले को शिक्षित किया सावित्री बाई फूले ने अर्जित शिक्षा का उपयोग नारी शिक्षा उत्थान  का समाज के कल्याण में किया यह अनुमान लगाना कितना कठिन होगा की ज्योतिबा फूले ने शिक्षा प्राप्त करने हेतु कितने कष्टों को सहन किया परन्तु इन्होने ना केवल  स्वय शिक्षा अर्जित की बल्कि अन्य महिलाओ को शिक्षित करने का उतरदायित्व भी वहन किया उन्होंने पहला विद्यालय पुणे में सन 1848 में प्रारम्भ किया उस काल में स्त्री शिक्षा एक समाज की कुरीतियों के खिलाफ विद्रोह के समान था सावित्री बाई के इस कदम का सबसे अधिक विरोध महिलाओ ने ही किया जब सावित्री बाई शिक्षा सेवा प्रदान करने विद्यालय जाती तो उनके ऊपर गोबर ,पत्थर मारे जाते थे परंतु उन्होंने विषम परिस्थितियों में भी हार नहीं मानी इस समस्या के हल हेतु अपने साथ एक और साड़ी ले जाती थी जिसे वह स्कूल में जाकर पहन लेती थी वे जानती थी की यदि दलित समाज के उत्थान का कोई उपाय है तो वह है शिक्षा उन्होंने अंग्रजी भाषा का भी समर्थन किया सावित्री बाई फूले
सावित्री बाई ने न केवल नारी -शिक्षा अपितु महिलाओ की स्थिति सुधारने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की उन्होंने समाज उपेक्षित बेघर विधवाओं के लिए विधवा आश्रम की स्थापना की सावित्री बाई  बाई ने न केवल नारी -शिक्षा अपितु महिलाओ की स्थिति सुधारने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की उन्होंने समाज उपेक्षित बेघर विधवाओं के लिए विधवा आश्रम की स्थापना की सावित्री बाई ने  सत्यशोधक समाज के माध्यम से महात्मा ज्योतिबा फूले के साथ मिलकर पहला विधवा विवाह करवाने में महत्वपूर्ण  भूमिका निभाई यह एक विद्रोह समाज में फैली कुरीतियों पाखंडो ,आडम्बरो के खिलाफ सनातनी हिन्दुओ ने कड़ा विरोध किया और इसे पाप अनैतिक अर्थ की संज्ञा तक दी परन्तु सावित्री बाई लगातार विधवाओं के मंगलमय जीवन के लिए संघर्ष करती रही महात्मा फूले के निधन के पश्चात् भी उनके अंतिम संस्कार के लिए साबित्री बाई फूले को अपने भतीजे से चुनौती का सामना करना पड़ा उनका भतीजा स्वय अंतिम संस्कार करना चाहता था परन्तु साबित्री बाई और उनके बेटे यग्वंत ने उनका विरोध किया और स्वय महात्मा फूले की चिता को अग्नि देकर , नारी सकती व् साहस का परिचय दिया उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन दूसरो के दुखो को कम करने के लिए अर्पित कर दिया पुणे में प्लेग फैलने के दौरान वे लगातार लोगो की सेवा में लगी रही और वह स्वयं इस बीमारी की चपेट में आ गई जिससे सन 1897 में उनका निधन हो गया
सचिन कुमार सेवक
sachinkr4777@gmail.comSachin Kumar Sewak

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