शीतला अष्टमी की पूजन विधि और उसका महत्त्व

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शीतला अष्टमी की पूजन विधि और उसका महत्त्व

अष्टमी से पहले दिन यानी सप्तमी की शाम को सूर्य ढलने के पश्चात तेल और गुड़ में खाने-पीने की वस्तुएं में मीठी रोटी, मीठे चावल, गुलगुले, बेसन एवं आलू आदि की नमक पूरियां तैयार की जाती हैं। मां शीतला को अष्टमी के दिन मंदिर में जाकर गाय के कच्चे दूध की लस्सी के साथ सभी चीजों का भोग लगाना चाहिए |

आप चाहे तो मीठी रोटी के साथ दही और मक्खन, कच्चा दूध, भिगोए हुए काले चने, मूंग और मोठ आदि प्रसाद के रूप में चढ़ाने की परम्परा है।

और सब माता शीतला को भोग लगाने के बाद मंदिर में बनी विभिन्न पिंडियों पर भी कच्ची लस्सी चढ़ाई जाती है तथा भगवान शिव शंकर भोलेनाथ के मंदिर में शिवलिंग पर कच्ची लस्सी चढ़ाकर मां से परिवार के मंगल की कामना के लिए प्रार्थना की जाती है।

आपको तो पता ही है की वैसे तो फाल्गुन मास की पूर्णिमा एवं फाल्गुन मास की संक्रांति से ही लोग नियम से प्रात: माता शीतला पर लस्सी चढ़ाना शुरू कर देते हैं तथा पूरा महीना माता शीतला की पूजा करते हैं परंतु जिन्होंने अब तक शीतला माता का पूजन किसी कारणवश नहीं किया है वे शीतला अष्टमी का व्रत करके अथवा मां पर कच्ची लस्सी चढ़ा कर मां की कृपा के पात्र बन सकते हैं। और ये बहुत शुभ माना जाता है |

माता शीतला गर्दभ पर विराजमान रहती हैं। मां के एक हाथ में झाड़ू, नीम के पत्ते और एक में कलश है जो स्वच्छता का प्रतीक है। इसकी बहुत ही मान्यता है और लोग बहुत ही सेवा करते है |

और सबसे ज्यादाआपको ये ध्यान रखना चाहिए की माता शीतला के पूजन में किसी प्रकार की गर्म वस्तु का न तो सेवन किया जाता है और न ही घर में इस दिन चूल्हा आदि जलाया जाता है। यहां तक कि चाय आदि भी नहीं पी जा सकती तथा पहले दिन बनाया गया भोजन ही बिना गर्म किए खाने की परम्परा है। नए सब इस व्रत के खिलाफ है, ठंडी वस्तुएं खाने से ही व्रत पूरा होता है |

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