ईश्वर होना आसान है लेकिन बुद्ध होना कठिन

 

बुद्ध पूजा नहीं है, इबादत भी नहीं है, बुद्ध मूर्ति नहीं है, स्तूप भी नहीं है, बुद्ध ना तो हीनयान में है और ना ही महायान में, बुद्ध अवतार भी नहीं है, ईश्वर भी नहीं है, बुद्ध को बुद्ध की धरती ने ही खारिज किया,बुद्ध केवल और केवल तार्किक बुद्धि को आश्रय देने वाली देह है।

खुद की खोज में लग जाना, सच जैसा भी हो स्वीकार करना, तर्क को धार देना, अंधविश्वास को ठोकर मारना, रूढ़िवादी सोच को खत्म करना और कल्पनाओं को त्याग कर वास्तविकताओं को गले लगाना, बुद्ध तो इसी में है, बोधगया में सिर्फ यादें हैं,बुद्ध तो दिनचर्या है।

बुद्ध ईश्वर को नहीं मानते अतः बुद्ध को ईश्वर ना बनाएँ। बुद्ध तो बुद्ध थे, उसे किसी सीमा अथवा परिधि में बांधना गलत है, बुद्ध त्यागी थे और आजाद भी, बुद्ध इंसान थे और केवल इंसान ही थे, कटु सच कहने की दिलचस्प कला के कलाकार थे बुद्ध, बुद्ध प्रकाश का पर्याय हैं।

शक करना आदत नहीं थी बल्कि सत्य का जरिया था। ना तो अहंकार और ना ही क्रोध, बुद्ध में उपकार और समाधान था, बुद्ध एक राह है, बुद्ध में डिकोडिंग का गुण है, कुछ हासिल करने के लिए कुछ छोड़ना पड़ता है, बुद्ध को भी घर छोड़ना पड़ा,बुद्ध में छटपटाहट थी, बुद्ध में मुस्कुराहट थी, बुद्ध होना मानो गति में होना।

दर्शन पढ़ने वालों के लिए बुद्ध दर्शन है, इतिहास पढ़ने वालों के लिए बुद्ध इतिहास है,संस्कृति पढ़ने वालों के लिए संस्कृति, साहित्य पढ़ने वालों के लिए साहित्य है, धर्म पढ़ने वालों के लिए बुद्ध धर्म है और सताए हुए लोगों के लिए बुद्ध अंतिम गंतव्य, यानी बुद्ध समाधान का पर्याय है, इसके बावजूद बुद्ध ईश्वर नहीं हैं।

बुद्ध से पता चलता है कि सच्चा ज्ञान एक-दो महीने में हासिल नहीं होता, इसके लिए इंसानों को साल दर साल लगातार मेहनत करना पड़ता है। बुद्ध से मालूम होता है कि हमलोग ब्रह्मांड के सबसे योग्य संसाधन हैं,खुद की वास्तविक गहराई को खोजकर खुद ही खुद में बहुमूल्य मोती प्राप्त कर सकते हैं, इसके लिए रामायण, महाभारत, बाइबिल, कुरान और गीता नहीं चाहिए।

बुद्ध आईना है, हमें दिखाने का प्रयास करते हैं कि “तुममें असीम संभावनाएं हैं , तुममें एक और बुद्ध है, जितने लोग हैं उतने बुद्ध हैं, बशर्ते बुद्ध होने के लिए तुम्हें तर्क-वितर्क से गुजरना होगा, त्याग करना होगा, अथक प्रयास करना होगा, खुद में मौजूद मौलिकता को पहचानना होगा, उसके समानांतर खून-पसीना एक करना होगा,तब संभव है बुद्ध का अंश मात्र होना।”

बुद्ध दुखी भी होता है और खुश भी, बुद्ध प्रेम भी करता है और त्याग भी,बुद्ध संघर्ष भी करता है और त्याग भी, बुद्ध गलती भी करता है और महान कार्य भी,बुद्ध सीखता है, खुद में बदलाव लाता है और दुनिया को सच से परिचित करवाता है, बुद्ध पैदा हुआ, जी भरके जिया, दुनिया को राह दिखाया और मर गया, बुद्ध होना आसान है और कठिन भी।

बुद्ध होने का मतलब है जमीनी इंसान होना,बुद्ध होने का मतलब है जिज्ञासाओं का होना, बुद्ध होना मतलब खोजकर्ता होना, बुद्ध होना मतलब सीधा-सरल सच्चा देह का होना, तमाम उठापटक से गुजर कर जो खुद को खोज ले वही बुद्ध है।

सच्चा इंसान हमेशा याद किया जाता है ना कि केवल किसी खास दिन। सच्चा इंसान मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च या स्तूप में नहीं रहता है, सच्चा इंसान दिल में रहता है,बुद्ध सच में हमारे दिल में है। बुद्ध को ईश्वर बनाना ही बुद्ध को खारिज करना है, बुद्ध को खारिज करना ही तर्क को खारिज करना है और जब तर्क खारिज हो जाए तब देह का क्या अस्तित्व ?

बुद्ध जी का अंतिम उपदेश अपने प्रिय शिष्य आनंद को

   ” अत्त दीपो भव ” 

अर्थात अपना प्रकाश स्वयं बनो।

नमो बुद्धाय

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