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नारायण गुरु के जीवन की वो कहानी जो सब ने छुपाई Narayana Guru History In Hindi

 समानता की संस्कृति के पोषक नारायण गुरु

Narayana Guru

26 अगस्त, 1854 – 20 सितंबर, 1928

नारायण गुरु ने कहा कि सभी मनुष्यों के लिए एक ही जाति, एक धर्म और एक ईश्वर होना चाहिए। नारायण गुरु मूर्तिपूजा के विरोधी थे। लेकिन वह ऐसे मंदिर बनाना चाहते थे, जहां कोई मूर्ति ही न हो। हाल ही में भारत के उपराष्ट्रपति ने श्री नारायण गुरु की कविताओं का अंग्रेज़ी अनुवाद, “नॉट मैनी, बट वन” लॉन्च किया है। नारायण गुरु भारत के महान संत एवं समाजसुधारक थे। कन्याकुमारी जिले में मारुतवन पहाड़ों की एक गुफा में उन्होंने तपस्या की थी। गौतम बुद्ध को गया में पीपल के पेड़ के नीचे बोधि की प्राप्ति हुई थी। उनका धर्म बुद्ध के नाम पर ही है। इसी तरह नारायण गुरु को उस परम ज्ञान की प्राप्ति एक गुफा में हुई। बुद्ध की तरह उनका “श्री नारायणा धर्म” भी उनके नाप पर ही है। इस तरह यहाँ दौनों में कई समनतायें मिलती हैं।

श्री नारायण गुरु का जन्म 26 अगस्त, 1854 को केरल के तिरुवनंतपुरम के पास एक गाँव चेमपज़ंथी में मदन असन और उनकी पत्नी कुट्टियम्मा के घर हुआ था। उनके मातापिता को नहीं था कि उनका बेटा एक दिन अलग तरह के मंदिरों को बनवाएगा। समाज को बदलने में भूमिका निभाएगा।

उस परम तत्व को पाने के बाद नारायण गुरु अरुविप्पुरम गये थे। उस समय वहां घना जंगल था। वह कुछ दिनों वहीं जंगल में एकांतवास में रहे। एक दिन एक गढ़रिये ने उन्हें देखा। उसीने बाद में लोगों को नारायण गुरु के बारे में बताया। परमेश्वरन पिल्लै उसका नाम था। वही उनका पहला शिष्य भी बना। धीरेधीरे नारायण गुरु सिद्ध पुरुष के रूप में प्रसिद्ध होने लगे। लोग उनसे आशीर्वादके लिए आने लगे। तभी गुरुजी को एक मंदिर बनाने का विचार आया। नारायण गुरु एक ऐसा मंदिर बनाना चाहते थे, जिसमें किसी किस्म का कोई भेदभाव हो। धर्म का, जाति का और ही आदमी और औरत का।

दक्षिण केरल में नैयर नदी के किनारे एक जगह है अरुविप्पुरम। वह केरल का एक खास तीर्थ है। नारायण गुरु ने यहां एक मंदिर बनाया था। एक नजर में वह मंदिर और मंदिरों जैसा ही लगता है। लेकिन एक समय में उस मंदिर ने इतिहास रचा था। अरुविप्पुरम का मंदिर इस देश का शायद पहला मंदिर है, जहां बिना किसी जातिभेद के कोई भी पूजा कर सकता था। उस समय जाति के बंधनों में जकड़े समाज में हंगामा खड़ा हो गया था। वहां के ब्राह्माणों ने उसे महापाप करार दिया था। तब नारायण गुरु ने कहा थाईश्वर तो पुजारी है और ही किसान। वह सबमें है।

दरअसल वह एक ऐसे धर्म की खोज में थे, जहां आम से आम आदमी भी जुड़ाव महसूस कर सके। वह नीची जातियों और जाति से बाहर लोगों को स्वाभिमान से जीते देखना चाहते थे। उस समय केरल में लोग ढेरों देवीदेवताओं की पूजा करते थे। नीच और जाति बाहर लोगों के अपनेअपने आदिम देवता थे। ऊंची जाति के लोग उन्हें नफरत से देखते थे। उन्होंने ऐसे देवीदेवताओं की पूजा के लिए लोगों को निरुत्साहित किया। उसकी जगह नारायण गुरु ने कहा कि सभी मनुष्यों के लिए एक ही जाति, एक धर्म और एक ईश्वर होना चाहिए।

उनका परिवार एझावा जाति से संबंध रखता था और उस समय के सामाजिक मान्यताओं के अनुसार इसे ‘अवर्ण’ (शूद्र) माना जाता था। उन्हें बचपन से ही एकांत पसंद था और वे हमेशा गहन चिंतन में लिप्त रहते थे। जातिगत अन्याय के खिलाफ: उन्होंने “एक जाति, एक धर्म, एक ईश्वर” (ओरु जति, ओरु माथम, ओरु दैवम, मानुष्यानु) का प्रसिद्ध नारा दिया। 

नारायण गुरु का आविर्भाव दक्षिणी राज्य केरल में ऐसे वक्त में हुआ था, जब वहां अस्पृश्यता घृणित रूप में मौजूद थी. कुछ जातियों के लोगों को न केवल अछूत माना जाता था, बल्कि उनकी छाया भी अन्यों को अपवित्र कर देती थी। एक समान आराध्य और धर्म को मानने के बावजूद इन लोगों को मंदिरों (और विद्यालयों) में प्रवेश से वंचित रखा गया था। ऐसे वक्त में नारायण गुरु इस सामाजिक जड़ता को तोड़ने और समाज में रचनात्मक बदलाव लाने में सफल रहे थे। उन्होंने इस मान्यता को ठुकरा दिया कि मंदिर का पुजारी केवल ब्राह्मण ही हो सकता है। अन्य मंदिरों में जिनका प्रवेश वर्जित था, वे भी यहां निर्बाध आ सकते थे। यहां किसी के लिए कोई भेदभाव नहीं था, न जाति का, न धर्म का और न ही आदमी और औरत का। इस मंदिर के निकट ही श्री नारायण गुरु ने अपना आश्रम बनाया था। साथ ही एक संस्था बना कर मंदिर संपदा की देखरेख और श्रद्धालुओं के कल्याण की व्यवस्था की थी। इसे बाद में श्री नारायण धर्म परिपालन योगम् (एसएनडीपी) नाम से जाना गया। बाद के दशकों में इस संस्था ने अनेक मंदिर और शिक्षण संस्थानों की स्थापना की।

श्री नारायण गुरु का दर्शन: श्री नारायण गुरु बहुआयामी प्रतिभा, महान महर्षि, अद्वैत दर्शन के प्रबल प्रस्तावक, कवि और एक महान आध्यात्मिक व्यक्ति थे। उन्होंने विभिन्न भाषाओं में अनेक पुस्तकें लिखीं। उनमें से कुछ प्रमुख हैं: अद्वैत दीपिका, असरमा, थिरुकुरल, थेवरप्पाथिंकंगल आदि। श्री नारायण गुरु मंदिर प्रवेश आंदोलन में सबसे अग्रणी थे और अछूतों के प्रति सामाजिक भेदभाव के खिलाफ थे। श्री नारायण गुरु ने वयकोम सत्याग्रह (त्रावणकोर) को गति प्रदान की। इस आंदोलन का उद्देश्य निम्न जातियों को मंदिरों में प्रवेश दिलाना था। इस आंदोलन की वजह से महात्मा गांधी सहित सभी लोगों का ध्यान उनकी तरफ गया। उन्होंने अपनी कविताओं में भारतीयता के सार को समाहित किया और दुनिया की विविधता के बीच मौजूद एकता को रेखांकित किया। 

उनकी मुख्य साहित्यिक कृतियाँ-

दार्शनिक: आत्मोपदेशशतकं, दैवदशकं, दर्शनमाल, अद्वैतदीपिक, अऱिव्, ब्रह्मविद्यापंचकं, निर्वृतिपंचकं, श्लोकत्रयी, होममन्त्रं, वेदान्तसूत्रं। प्रबोधन: जातिनिर्ण्णयं, मतमीमांस, जातिलक्षणं, सदाचारं, जीवकारुण्यपंचकं, अनुकम्पादशकं, धर्म्म, आश्रमं, मुनिचर्यापंचकं। गद्य: गद्यप्रार्त्थन, दैवचिन्तनं, दैवचिन्तनं, आत्मविलासं, चिज्जढचिन्तकं, अनुवाद, ईशावास्योपनिषत्त्, तिरुक्कुऱळ्, ऒटुविलॊऴुक्कं।

विज्ञान में योगदान: श्री नारायण गुरु ने स्वच्छता, शिक्षा, कृषि, व्यापार, हस्तशिल्प और तकनीकी प्रशिक्षण पर ज़ोर दिया।श्री नारायण गुरु का अध्यारोप (Adyaropa) दर्शनम् (दर्शनमला) ब्रह्मांड के निर्माण की व्याख्या करता है। इनके दर्शन में  दैवदशकम् (Daivadasakam) और आत्मोपदेश शतकम् (Atmopadesa Satakam) जैसे कुछ उदाहरण हैं जो यह बताते हैं कि कैसे रहस्यवादी विचार तथा अंतर्दृष्टि वर्तमान की उन्नत भौतिकी से मिलते-जुलते हैं। श्री नारायण गुरु की सार्वभौमिक एकता के दर्शन का समकालीन विश्व में मौजूद देशों और समुदायों के बीच घृणा, हिंसा, कट्टरता, संप्रदायवाद तथा अन्य विभाजनकारी प्रवृत्तियों का मुकाबला करने के लिये विशेष महत्त्व है।

श्री नारायण गुरु की मृत्यु 20 सितंबर, 1928 को हो गई। केरल में यह दिन श्री नारायण गुरु समाधि (Sree Narayana Guru Samadhi) के रूप में मनाया जाता है।

केरल के शूद्र थे नारायणा गुरु: उनके समय “नायर” शूद्र वर्ण होने के कारण निचले स्तर की जाति मानी जाती थी उनके बाद, इजव्हा जाति और फिर उसके नीचे के क्रम में अनेकों दलित जातियों को रखा जाता था। दलित जातियों के अधिकतर लोग खेतिहर मज़दूर थे वे मेहनत मजदूरी के साथ मछली पकड़ने और ताड़ी निकलने का काम करते थे। इन समुदायों की औरतों के साथ उस समय इतना महाघोर अन्याय हो रहा था कि उन्हें स्तन ढकने तक का भी अधिकार नहीं था। इस प्रथा को बंद करवाने के  लिए विद्रोहस्वरूप एक शूद्र महिला को अपने स्तन ही काट कर जमीं पर रखने पड़े। उस बहादुर महिला का नाम बहुत कम लोग जानते होंगे और जो जानते हैं उनको बताने में आज शर्म आती होगी। उसका नाम था नंगेली।

किसी स्कूल के इतिहास की किताब में उनका ज़िक्र या कोई तस्वीर भी नहीं मिलेगी। लेकिन उनके साहस की मिसाल ऐसी है कि एक बार जानने पर कभी नहीं भूलेंगे, क्योंकि नंगेली ने स्तन ढकने के अधिकार के लिए अपने ही स्तन काट दिए थे। केरल के इतिहास के पन्नों में छिपी ये लगभग सौ से डेढ़ सौ साल पुरानी कहानी उस समय की है जब केरल के बड़े भाग में त्रावणकोर के राजा का शासन था जातिवाद की जड़ें बहुत गहरी थीं और निचली जातियों की महिलाओं को उनके स्तन न ढकने का आदेश था। उल्लंघन करने पर उन्हें ‘ब्रेस्ट टैक्स’ यानी ‘स्तन कर’ देना पड़ता था। ये वो समय था जब पहनावे के कायदे ऐसे थे कि एक व्यक्ति को देखते ही उसकी जाति की पहचान की जा सकती थी। ब्रेस्ट टैक्स का मक़सद जातिवाद के ढांचे को बनाए रखना था। ये एक तरह से एक औरत के निचली जाति में पैदा होने की कीमत थी। इस कर को बार-बार अदा कर पाना इन ग़रीब समुदायों के लिए मुमकिन नहीं था। उस दौर में दलित समुदाय के लोग ज़्यादातर खेतिहर मज़दूर थे और ये कर देना उनके बस के बाहर था। ऐसे में एड़वा और नायर समुदाय की औरतें ही इस कर को देने की थोड़ी क्षमता रखती थीं। इसी बीच एड़वा जाति की एक महिला, नंगेली ने इस कर को दिए बग़ैर अपने स्तन ढकने का फ़ैसला कर लिया। केरल के चेरथला में अब भी इलाके के बुज़ुर्ग उस जगह का पता बता देते हैं जहां नंगेली रहती थीं। बताया जाता है कर मांगने आए अधिकारी ने जब नंगेली की बात को नहीं माना तो नंगेली ने अपने स्तन ख़ुद काटकर उसके सामने रख दिए। लेकिन इस साहस के बाद ख़ून ज़्यादा बहने से नंगेली की मौत हो गई। बताया जाता है कि नंगेली के दाह संस्कार के दौरान उनके पति ने भी अग्नि में कूदकर अपनी जान दे दी। नंगेली की याद में उस जगह का नाम मुलच्छीपुरम यानी ‘स्तन का स्थान’ रख दिया गया। पर समय के साथ अब वहां से नंगेली का परिवार चला गया है और इलाके का नाम भी बदलकर मनोरमा जंक्शन पड़ गया है। नगेली ने यह बलिदान अपने लिए नहीं किया बल्कि सारी औरतों के लिए ये कदम उठाया था, जिसका नतीजा ये हुआ कि राजा को ये कर वापस लेना पड़ा।”

केरल में वाम मोर्चा को मुख्यतः उन दलित और पिछड़ी जातियों का समर्थन मिलता है। जिन्होंने समाज सुधार और आत्म सम्मान के आंदोलनों से अपनी स्थिति काफी अच्छी की है। ऐसा सबसे बड़ा समूह है झझवा लोगों का जो पारंपरिक रूप से ताड़ी निकालने का काम करते थे। इनकी आबादी प्रदेश में 22 फीसदी है और उनके दो तिहाई वोट वाम मोर्चा को मिलते हैं। अन्य पिछड़ी जातियों और 8 फीसदी दलितों में भी वाम मोर्चे को ज्यादा वोट मिलते हैं। नायरों की आबादी लगभग 15 फीसदी है और वे आमतौर पर वाम मोर्चा के खिलाफ होते हैं। हाल के चुनावों में भाजपा को इसी समुदाय का समर्थन सबसे ज्यादा मिला है। वायसनाड की पहाड़ियों में थोड़े से आदिवासी हैं पर उनकी संख्या इतनी नहीं है कि वे राज्य की राजनीति को ज्यादा प्रभाविक कर पाएं। केरल के मतदान में सिर्फ जाति समुदाय ही नहीं धर्म भी आधार रहता है। सामाजिक जातीय समूहों की कमजोर आर्थिक स्थिति से भी जुड़ा है वाम मोर्चे की तरफ लोगों का स्वाभाविक रुझान।

संघ और भाजपा ने हाल में ऑर्थोडॉक्स और जेकोबाईट चर्चो के बीच एक पुराने सम्पति विवाद को सुलझाने में काफी रूचि दिखलाई। उन्होंने एक हजार साल पुराने एक ऑर्थोडॉक्स चर्च को राष्ट्रीय राजमार्ग के चौड़ीकरण के लिए गिराए जाने से भी बचाया। चर्च के अलावा, संघ और भाजपा इजवा समुदाय में घुसपैठ करने का प्रयास भी कर रहे हैं। इजवा वही समुदाय है जिसमें नारायण गुरु का जन्म हुआ था। यह केरल का सबसे बड़ा हिंदू समुदाय  है और लंबे समय से ब्राह्मणवाद के कट्टर विरोधी के रूप में जाना जाता रहा है।

सन् 1979 से – मतलब करीब 42 सालों से – यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) के ज़रिए मुस्लिम लीग का नायरों और सीरियन ईसाईयों से निकट जुड़ाव रहा है। इन 42 वर्षों में से 21 वर्षों में इन समुदायों का राज्य पर शासन रहा है। यूडीएफ की सरकारों ने इन समुदायों को राज्य की मदद से समृद्ध बनने का भरपूर मौका दिया।
सन् 1990 के दशक से देश के राजनैतिक फलक पर संघ/भाजपा का उदय शुरू हुआ, जिसकी अंतिम परिणति थी 2014 में उनका केंद्र में सत्ता में आना। इस अवधि में नायर मतदाताओं के एक बड़े तबके ने यूडीएफ से किनारा कर राष्ट्रीय स्तर पर उदयीमान संघ/भाजपा का दामन थाम लिया। सन् 1970 के चुनाव, जो यूडीएफ के गठन के पूर्व राज्य का अंतिम ‘सामान्य’ चुनाव था, में संघ परिवार को 0.6 प्रतिशत मत प्राप्त हुए थे। वहीं सन् 2016 के विधानसभा चुनाव में उसे 10.55 प्रतिशत मत प्राप्त हुए। यह मुख्यतः नायरों की बदौलत ही हो सका, जो राज्य की आबादी का 12 प्रतिशत हैं। केरल में संघ और भाजपा का अर्थ है नायर। केरल में वे ही भगवा ध्वजधारियों के खेवैया हैं। राज्य में अगर भाजपा अपने कदम जमा पा रही है तो इसका अर्थ यह है कि नायर समुदाय ने यूडीएफ को त्याग दिया है और इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि नायर मुसलमानों के खिलाफ हो गए हैं।

यूडीएफ में अब मुसलमानों का साथ देने वाला एक ही समुदाय बचा है और वह है ईसाई समुदाय। हिंदुत्ववादियों अर्थात नायरों को लग रहा है कि यह चुनाव मुसलमानों को पूरी तरह अलग-थलग करने का एक सुनहरा मौका है। ईसाई धर्म के पास एक वैश्विक शक्ति है। इतिहास गवाह है कि केरल की पुरानी सामंती अर्थव्यवस्था में जमींदार बतौर नायरों और ईसाईयों ने दमनकारी जाति व्यवस्था को बनाए रखने में खासी भूमिका निभायी। अब ऐसा लग रहा है – और यह संभव भी है –  कि नायरों के वर्चस्व वाले आरएसएस और सीरियन चर्च में एक समझौता हो गया है। और वह यह कि जहां तक संभव हो, चर्च आरएसएस की निंदा करने से बचे और संघ के एजेंडा के अनुरूप इस्लाम को आतंकवाद फैलाने और महिलाओं के प्रति दुराग्रह रखने का दोषी ठहरा कर उस पर हमले करे। हाल में केरल के (सायरो-मलाबार कैथोलिक) चर्च ने एक वक्तव्य जारी कर कहा कि ‘लव जिहाद’ सचमुच हो रहा है। 

मुसलमान केरल की धरती के पुराने निवासी हैं। वे राज्य की कुल आबादी का 27 प्रतिशत हैं औ राज्य का सबसे बड़ा धार्मिक समुदाय हैं। वे केरल की बहुवर्णी संस्कृति का अभिन्न और मुख्य भाग हैं। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि मुसलमान न तो अलग-थलग हों, न वे यह महसूस करें कि उन्हें अलग-थलग कर दिया गया है और ना ही उन्हें ऐसा लगे कि उन्हें अलग-थलग करने के प्रयास हो रहे हैं। हमें उन्हें ‘दूसरा’ नहीं बनने देना है। यह न केवल गलत होगा वरन् राज्य की सामाजिक एकता के लिए एक बहुत बड़ा खतरा बन जाएगा।

दरअसल, हिंदुत्ववादियों की रणनीति दोहरी नहीं बल्कि तिहरी है। वे मुसलमानों के खिलाफ अभियान चला रहे हैं, इजवाओं को रिझा रहे हैं और नारायण गुरु पर कब्ज़ा कर रहे हैं। ये तीनों काम एक साथ, समानांतर रूप से किए जा रहे हैं। वे अलग-अलग लग सकते हैं परन्तु वे एक-दूसरे से संबद्ध हैं।
संघ अनार्य और अवर्ण समुदायों पर डोरे डाल रहा है। उसका उद्देश्य इन समुदायों को आर्य, सवर्ण सामाजिक व्यवस्था का हिस्सा बनाकर एकसार, संस्कृत-आधारित, ब्राह्मणवादी हिन्दू समुदाय का निर्माण करना है। जैसा कि गोलवलकर का कहना था – “एक देश, एक राष्ट्र, एक विधायिका, एक कार्यपालिका”।
इजवाओं को जोड़ने के पीछे चुनावी गणित भी है। इजवा केरल का सबसे बड़ा हिन्दू समुदाय है (आबादी का करीब 22 प्रतिशत)। भाजपा नायरों में जितनी घुसपैठ कर सकती थी, वह कर चुकी है। नायर कुल आबादी का 11.9 प्रतिशत हैं और सन् 2016 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को 12 प्रतिशत और 2019 के लोकसभा चुनाव में 13 प्रतिशत मत प्राप्त हुए थे। साफ़ है कि नायरों के सहारे और आगे बढ़ने की गुंजाइश अब है नहीं। भाजपा को यदि चुनाव में और ज्यादा वोट पाने हैं तो उसे इजवा समुदाय को अपने साथ लेना ही होगा। इजवा मुख्यतः लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) के साथ हैं। अगर वे भाजपा के साथ जुड़ जाते हैं तो इससे पार्टी एक तीर से दो निशाने साध सकेगी – उसका आधार मज़बूत होगा और एलडीएफ का खोखला।

अगर आप सावरकर की व्हाट इज़ हिंदुत्व या गोलवलकर की बंच ऑफ़ थॉट्स – जो संघ और हिन्दू महासभा की बाइबिल हैं – पढ़ें तो आपको यह साफ़ समझ में आ जाएगा कि हिंदुत्व आंदोलन केवल मुस्लिम विरोधी नहीं है। वह ईसाई विरोधी भी है। हिंदुत्व जानता है कि अगर देश के ओबीसी और एससी/एसटी हिन्दू धर्म को त्याग कर किसी अन्य धर्म का वरण करेंगे तो वह धर्म ईसाईयत होगा, इस्लाम नहीं। ईसाई दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे धनी धर्म है। पृथ्वी के लगभग 2.3 अरब निवासी (दुनिया की आबादी का एक-तिहाई) ईसाई हैं और दुनिया के 195 देशों में से 120 में ईसाईयों का बहुमत है। और इन देशों में दुनिया के सबसे शक्तिशाली राष्ट्र शामिल हैं। इसके विपरीत, केवल 50 देशों की बहुसंख्यक आबादी मुस्लिम है। 

केरल की हिंदू जातियां-  केरल के हिंदुओं में नम्बूदरी ब्राह्मण प्रभु जाति है बाकी सभी लगभग 420 जातियाँ उनकी धार्मिक प्रजा के रूप में आदेश पालक हैं। केरल हर गाँव में औसतन 17 जाति समूह रहते हैं। इनमें कितना भेदभाव है, इसको एक उदाहरण से समझा जा सकता है – एक नायर व्यक्ति,  परंपरागत रूप से एक नंबूदरी से संपर्क कर सकता है, लेकिन उसे स्पर्श नहीं कर सकता। एक एझावा को ब्राह्मण से 36 कदम की दूरी बनाकर रखनी चाहिए, और एक पुलाया को 96 कदम दूर रहना चाहिए। जातियों को यहां तक परिभाषित किया जाता है कि उनकी दृष्टि मात्र भी अपवित्र है। केरल के हिंदुओं के बीच जाति क्रम-श्रेणियों  का विस्तार लगभग एक तरफा सीढ़ी है और जाति रैंकिंग के अधिकतम विस्तार के लिए चरम सीमा तक सभी जातियों को योग्यतानुसार चार संरचनात्मक दर्जों (वर्णों) में समाहित है।

एझावाज़ और थियास जाति- आजकल इज़हावन, ईशान, एज़हवान, एज़ुवा, इज़ुवा, इशुवा, इज़ुवन, इज़ुवन, इज़ह्वा, इज़हावन, इज़ावन, इलुवन, इलुवन, इरावा, इरुवा, इज़हवास और थियायस आदि उपजातियों में विभाजित हैं और यह सभी ओबीसी में आते हैं। एझावा केरल के हिन्दू समुदायों के बीच में सबसे बड़ा समूह है। उन्हें प्राचीन तमिल चेर राजवंश के विलावर संस्थापकों का वंशज माना जाता है, जिनका कभी दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों पर शासन हुआ करता था। मालाबार में उन्हें थिय्या कहा जाता है, जबकि तमिलनाडु में वे बिल्लवा नाम से जाने जाते हैं। उन्हें पहले ‘ईलवर’ नाम से जाना जाता था। वे आयुर्वेद के वैद्य, योद्धा, कलारी प्रशिक्षणकर्ता, सैनिक, किसान, खेत मजदूर, सिद्ध चिकित्सक और व्यापारी हुआ करते थे। कुछ लोग कपड़ा बनाने, शराब के व्यापार और ताड़ी निकालने के कामों में भी शामिल थे। इझाथु मन्नानर जैसे एझावा (थिय्या) राजवंशों का भी केरल में अस्तित्व है।इस समुदाय के अंतर्गत का योद्धा वर्ग चेकावर स्थानीय सरदारों और राजाओं की सेना का एक अंग हुआ करता था। उनके लोग प्रसिद्ध कलारी पयट्टू विशेषज्ञ भी थे। उत्तरी केरल के इस समुदाय के सदस्यों के बीच सर्कस एक विशेष आकर्षण रखता है और भारत के अनेक प्रसिद्ध कलाबाज़ इस समुदाय से आते हैं।

इजवा और मुसलमान कुल मिलाकर केरल की आधी आबादी हैं। एससी, एसटी और गैर-इजवा ओबीसी का कुल आबादी में प्रतिशत 22 है। इसका अर्थ यह है कि अगर मुसलमान, इजवा, गैर-इजवा ओबीसी, एससी और एसटी मिल जाएं तो वे राज्य की आबादी का 70 प्रतिशत से अधिक होंगे। वे सभी वर्ण व्यवस्था के चलते सामाजिक अन्याय का शिकार रहे हैं और आज भी हैं। केरल के भविष्य की रक्षा के लिए यह ज़रूरी है कि ये पांच समूह, जो अलग-अलग जातियों और धर्मों से हैं, केरल के लिए एक साझा एजेंडा बनाएं जो धर्मनिरपेक्ष, प्रगतिशील और सामाजिक न्याय पर आधारित हो।

धार्मिक, क्षेत्रीय और जाति भेदभाव की जटिलता के कारण विवेकानंद ने केरल को सांप्रदायिकता का “पागलखाना” कहा था। केरल की आबादी में 27 फीसदी मुस्लिम, 18 फीसदी ईसाई और 55 फीसदी हिंदू हैं, इनमें 95 फीसदी वे जातियां हैं जो कभी शूद्र (OBC/SC/ST) जातियों की अंग हैं। मुस्लिम समुदाय, जिसे मपिल्लस कहा जाता है, केरल में नौवीं शताब्दी से आया है।

केरल कई मामलों में देश से आगे चलता है, यहां 1950 के दशक में ही गठबंधन की राजनीति शुरू हो गयी थी और 1960 के दशक में तो यहां गठबंधन बन गए थे। इन दो दशकों में राज्य में सारी राजनीतिक उठापटक चली पर इसी दौरान यहां के लोगों ने सामाजिक परिवर्तन की राजनीति में असली भूमिका को भी ठीक से समझ लिया। 

लोकतांत्रिक मोर्चा और वाममोर्चा का मौजूदा स्वरूप 1980 में दशक में बना और बहुत थोड़े बदलावों के साथ अभी तक चल रहा है। बाक़ी मुल्क अभी भी केरल की तरह गठबंधन चलाने का गुर सीखने में ही व्यस्त है। बाकी मुल्क को गठबंधन की राजनीति मंडल-युग और कांशीराम की बहुजन राजनीति के उदय के बाद में समझ में आई। भाजपा की हिदुत्व की राजनीति अभी वहां वेअसर दिखाई देती है। इस सामाजिक परिवर्तन में नारायणा गुरु के स्वाभिमान आंदोलन का बड़ा हाथ है। कहा जा सकता है कि आज के केरल में दिख रहे सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक विकास की नींव श्री नारायण गुरु और उनके द्वारा स्थापित एसएनडीपी ने रखी थी। श्री नारायण गुरु की शिक्षाओं को इस साल से केरल के स्कूली पाठ्यक्रम में भी शामिल किया गया है।

श्री नारायण गुरु की प्रेरणा से उनके भक्तों ने केरल के पड़ोसी राज्यों में भी ऐसे मंदिरों की स्थापना की थी, जिसके दरवाजे सभी मनुष्यों के लिए खुले थे। इन्हीं में मंगलोर के कुद्रोली में 1912 में स्थापित प्रतिष्ठित श्री गोकर्णनाथेश्वर मंदिर भी है, जिसमें प्राण प्रतिष्ठा खुद श्री नारायण गुरु ने की थी। इस मंदिर में दो विधवा महिलाओं, 67 साल की लक्ष्मी और 45 साल की इंद्रा को पुजारी नियुक्त किया गया है। नियुक्ति से पहले दोनों महिलाओं को पुजारी के रूप में काम करने के लिए चार महीने का प्रशिक्षण दिया गया था। मंदिर प्रबंधन की इस पहल की देशविदेश में व्यापक सराहना की गयी थी। हालांकि, जैसा कि हर सुधारवादी कदम के बाद होता रहा है, कुछ स्थानीय कट्टरपंथी समूह इसके विरोध में भी उतरे थे।

के सी पिप्पल

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