अतिथि तुम कब जाओगे – Atithi-Tum-Kab-Jaoge

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‘नगरी-नगरी फिरा मुसाफिर…घर का रस्ता भुल गया...

 

‘अजीब सा काज़ल उसने मेरे आँखो में डाला है…
के हर शरीफ नजरमें कुछ और भी नजर आता…
सामनेवालों की मनकी बात नजरों से नहीं, दिल और दिमाग से पता करनी पडती है…

जैसा ओ बोलता है, वैसा ओ होता नहीं, और जैसा ओ होता है, वैसा किसी-किसी को समझ मे आता ही नहीं…

ले किन मेरा नजरों का नेटवर्क हमेशा अॉनलाईन होता है…

और मेरी नजर से अगर कोई बात छुटती ही नहीं है, तो सोचो…

जिस की दुनीयाँ पर नजर है, उससे कोई बात कैसे छुट सकती है…
आपने बहुत ही बडा हवेली जैसा घर बनाया है…

और आपके अंदर इंन्सानीयत भी बहोत है… आजकल तो मंदिर-मस्जीदों के काम कभी पुरे होते नहीं, तो हम संसारी लोगों के घरो के काम कैसे पुरे होगे…?

ओ तो चलता ही रहेगा…

और संसार तो कभी किसी का पुरा हुवा ही नहीं है…
आपका घर आपकी शान है…

और दुसरों को जलाने के लिए बुला बुलाकर घर दिखाना आपका काम है…

और आपने मुझे भी जिद् करके निमंत्रीत किया है…
” अरे महाराजजी… कभी तो सेवा का मौका दो…

अब यहाँ पर रहने की, खाने-पिने की कोई भी चिंता नहीं रही…

आपके आशिर्वाद से घर अपना इतना बडा बन गया है,

कि पचास महेमान भी आकर आराम से ठहर सकते है…

और पुज्यश्री…

हमारी पत्नी भी बडी जिद् कर रही है आपको बुलवाने के लिए… आप बस दो दिन का समय दो…

आप हमे जिद् करके घर पर आने का समय निश्चिंत करते हो…

और एक दिन परिवारके साथ तय समयके अनुसार हम आपके शहेर मे पहुँच ही गये…

आप रेल्वेस्टेशन पर लेने आये थे…

आपकी शानदार गाडी मे बैठकर हम घर पर पहुँच ही गये…

आपकी पत्नी, बच्चे और परमनंट आपही के पास रहने वाली आपकी सांस भी बडा ही मुस्कूराकर हमारा स्वागत करते है…

आप की पत्नी हमारी आरती उतारकर, तिलक करवाकर कहेगी…

” आज तो स्वयं भगवानही हमारे घर पधारे है…

अब तो आठ दिन हमलोग आपको जाने ही नहीं देंगे…

पक्का …? यकिनके साथ कह रहे हो ना…

और हम घरमे दाखिल हुए…

आपकी हवेली देखकर हमे भी कहां इतनी खुशी हुई,

लेकिन प्रसन्नता तो दिखानीही पडती है…

पानी, चाय, बिस्कीट और नमकीन पहले पाच मिनट में ही आया है…

आप लोग परोसनेके लिए बडेही सतर्क हो यार…

और हमलोग भी खानेके लिए उतनेही तत्पर थे…

लेकिन फिर भी हम कहेंगे…
“अरे भाभीजी, आपने इतना कष्ट क्यूँ उठाया…

बस चाय पि लेते थे…
[ तु खा ले यार चुपचाप… क्यूँ ड्रामा करता है…? ]
ना ना करते हुये भी हम लोगों ने आपकी पुरी प्लेटे साफ कर दी…

बचे हुये नमकीन काजू और पिस्ते मेरे बेटे ने जेबो में भर लिये…

मेरा बिचवाला बच्चा बडा ही निडर है…

ओ बिलकुल भी शरमाता नहीं…

वैसे तो तिनो भी बच्चोंके बारेमे मै अब क्या कहूं…

बुलाकर देखो कभी…
अब पंधरा-बिस मिनीटमें हमलोग बिलकुल घुलमील गये…

आप का घर हमें बिलकुल अपना ही घर लगने लगा है…

मेरा छोटा बच्चा तो सिधा बाथरूम मे जाकर पानी खेलने लगा है…

बिचवाला कन्हैया काजू खाते खाते आपके ढाई लाख रूपिये के सोफेपर ब्रेकडांन्स् करने लगा है…

बडा बेटा बारा सालका है…

ओ कहींपर उछलकुद नहीं करता…

उसने रिमोट हाथ में लेकर सिर्फ ठका ठक् टिव्ही के चैनल बदलना शुरू किया है…
‘ अब आप कैसा महेसूस कर रहे हो…?’
‘ आपकी सांस घर में बर्तन क्यूँ पटक् रही है…?’
हमारा छोटा पप्पू पुरा बाथरूम की वाट लगा रहा है…
कन्हैया सोफे पर डांन्स कर रहा है…
मै कन्हैया को अब डांटता हूं …
” नहीं… नहीं बेटे… ऐसा नहीं करना… ये अंकल क्या कहेंगे…? जरासा शांत बैठना कनू …!”
मेरे डांटनेके बाद आप क्या कहोगे…?
” अरेरे… महाराज जी…! छोडो भी… बच्चोंके तरफ ध्यान नहीं देना… खेलने दो उसको… बडा प्यारा बच्चा है…!”
‘ अच्छा …?  दिलसे कह रहे हो…?  फिर ठिक है…! और कुद ले बेटा… अपनाही घर है…!’
लेकिन ये बात दिल से नहीं थी…! मन में तो यहीं है, कि साले के दो थप्पड लगा दू …! आपकी सांस भी बार-बार हॉल मे आकर सुना रही है…
” बस…खाना तो तैय्यार है…

आप लोग भोजन करके आराम करीयेगा…

उपर के कमरे मे एसी चालू करके रखा है…

बच्चे भी आराम करेंगे…
हमे खाने की जलदी नहीं थी, लेकिन बुढ्ढि को ‘हमे उपर भेजने की’ जलदी थी…!

टिव्ही देखते-देखते ही बडे बेटे ने आपसे पुछा…
” अंकल… कार्टून चैनल नहीं आता…?”
” नहीं बेटे… मुझे कुछ पता नहीं… मै तो खाली आस्था और संस्कार देखता हूं …!”
फिर मेरा बेटा कंम्पूटरपर जाकर बैठा…

अॉन किया… पांच मिनीट बाद पुछता है…
” अंकल… पासवर्ड क्या है…?”
” मुझे मालूम नहीं बेटे…

ओ तो अपनी बडी दिदी को ही पता होगा…!”
[ बता दे यार… सब पता है तुझे…!]
अब तक सोफेपर डांन्स् करने वाला कन्हैया पिस्ते के छिलके बिखर चुका था…
छोटा पप्पू भी बाथरूम मे पुरा गिला हो चुका था…
‘ अब आप कैसा महेसूस कर रहे हो…?

हमारे रूटकी तो सभी लाईने व्यस्त है…

आपके दिलकी लाईन क्या बोल रही है…?’
बहोत-बहोत गुस्सा है मन में… फिर भी आप कुछ बोल नहीं पाओगे…

क्यूँ कि आप सिर्फ संस्कार देखते हो…

और हमारे तो देख भी लिये…!
सोचो…! हमारी बहुत ही गलतीयों को आप बर्दाश्त करते हो, जानते सबकुछ है, फिर भी कुछ बोलते नहीं हो…

क्यूँ कि महेमान है…!

सोचो… परमात्माकी भी यही हाल है… ओ बोलता कुछ नहीं…!

लेकिन जानता सबकुछ है…!

हमलोग महेमान है इस धरतीपर…!

जरासी उछलकुद कम करो…!

एकही चैनल अच्छा देखो…!

पानीकी बरबादी मत करो…!
आठ दिन रहनेवाले थे हमलोग…

लेकिन अब आप सोचते होंगे…
‘ यार… कहांसे दुर्बूध्दी आ गई, और इनको बुलाया…?’
कहींपर भगवानकी भी यहीं सोच आपको धरतीपर बुलाकर तो नहीं चल रही है ना…?
‘ कहां-कहांसे इकठ्ठा करू ऐ जींदगी तुझको…?
जीधर देखता हूं … तु ही तु बिखरी पडी है…!’

BHAU-THORTAH

भाऊ थोरात शिरडी

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