स्वामी अछूतानन्द जी 

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स्वामी अछूतानन्द जी ने दलित समाज में चेतना और उनके उत्थान के लिए आदि हिन्दू आंदोलन की शुरुआत की अपने आंदोलनों को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने साहित्य का सहारा लिया वर्तमान में यह साहित्यिक आंदोलन ही हिंदी दलित साहित्य आंदोलन का आधार बन गया है स्वामी अछूतानन्द जी का जन्म उतर प्रदेश के मैनपुरी जिले में सन 1879 में हुआ था उनका बचपन का नाम हीरालाल था जीवन के प्रारंभिक दिनों में ही जातिगत झगड़ो के कारण उन्हें फरुखाबाद के अपने गाँव को छोड़कर जाना पड़ा परिवार के कई सदस्य अंग्रेजी फौज में शामिल थे जिसके कारण अछूतानन्द जी की शिक्षा अंग्रेजी फौज के स्कूल में हुई जिसे फ़लस्वरूप उन्हें अंग्रजी भाषा का अच्छा ज्ञान  था शिक्षा प्राप्ति के साथ तथा उसके पश्चात् भी उनका मन साधुओ की सत्संग में लगता था वे कई वर्षो तक साधु संतो के साथ देश के भिन्न क्षेत्रों में भ्रमण कर भिन्न भाषाओ व साहित्य का ज्ञान अर्जित किया वर्ण -व्यवस्था के विरुद्ध सामने आया आर्य समाज आंदोलन से स्वामी अछूतानन्द प्रभावित हुए वे आर्य समाजी सच्चिदानंद  के शिष्य बनकर आर्य  समाज का प्रचार करने लगे इस समय उन्हें अपना नाम बदलकर हीरालाल से स्वामी हरिहरानंद कर लिया वे कई वर्षो तक आर्य समाज का प्रचार करते रहे परन्तु कुछ ऐसे प्रकरण हुए जिससे उन्हें यह स्पष्ट हो गया की आर्य समाज के लोग भी ब्रम्हणवाद से ग्रसित है आर्य समाज के द्व्रारा चलाया जा रहा जाति-पाँति विरोधी आंदोलन केवल पाखंड मात्र है अतःउन्होंने आर्य समाज का त्याग कर दिया और अपना नाम बदलकर हरिहरानंद से हरिहर कर लिया अब हरिहर आर्य समाज में व्याप्त कुरीतियों पाखंडो को उजागर करने लगे जिससे आर्य समाज उनके विरोधी हो गए परन्तु स्वामी जी ने लगातार उनके ढोंग को समाज के सामने लाते रहे और उनसे मिलने वाली सभी वैचारिक चुनौतियों को परास्त किया उन्होंने मनुस्मृति धर्मशास्त्रों पर कड़ा हमला किया एक बार फिर उन्होंने  अपना नाम बदलकर स्वामी अछूतानन्द हरिहर कर लिया उन्होंने दलित समाज के उत्थानो व चेतना के लिए आदि हिन्दू आंदोलन की शुरुआत की उन्होंने स्पष्ट किया की शूद्र कही जाने वाली सभी जातियां ही आदि हिन्दू है हम मूल निवासियों की संतान है उनके आंदोलन से दलित समाज में चेतना का संचार हो रहा था दलित  जातियों में चेतना उत्पन्न करने के लिए कई संभाएँ और राष्ट्र अधिवेशन किए जिसने दलित लोगो ने बढ़ -चढ़कर भाग लिया परन्तु हिन्दुओ को यह आंदोलन रास नहीं आ रहा था इसलिए उन्होंने स्वामी जी पर झूठे आरोप लगाए निंदा की बदनाम करने की कोशिश तक की इन सब के बावजूद स्वामी जी लगातार संघर्ष करते रहे दलित समाज में चेतना का प्रसार करने के लिए उन्होंने साहित्य का भी सहारा लिया दलित रचित रचनाएँ किसी प्रेस में नहीं छप पाती थी इसलिए उन्होंने आदि हिन्दू प्रेस की स्थापना की वह हिंदी की दलित पत्रकारिका के प्रथम संस्थापक व संपादक थे
सचिन कुमार सेवक
sachinkr4777@gmail.comSachin Kumar Sewak

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