संत कबीर 

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आज भी कबीर के दोहे उतने ही प्रसिद्ध प्रासांगिक है जितने उनके समय में थे जन्म की विभिन्न भ्रांतियों के बीच सामान्यता ;यह माना जाता है की उनका जन्म काशी की एक विधवा स्त्री द्वारा हुआ जो की उसे तालाब के पास छोड़ गई थी उनका पालन पोषण नीरू जुलाहा और उनकी पत्नी नीमा ने किया पारिवारिक व्यवसाय के अनुरूप ,कबीर भी बचपन में परिवार के पालन पोषण के लिए जुलाहा का कार्य करते थे कबीर संत स्वामी रामानन्द जी को गुरु मनाना चाहते थे परन्तु यह संभव न हो सका लेकिन कबीर जी यह संकल्प ले लिया था की वे उन्हें अपना गुरु बनाएगे एक दिन कबीर पच्चगंगा की सीढ़ियों से उतर रहे थे तो कबीर के शरीर पर उनका पैर पड़ गया और उनके मुख से निकलने वाले शब्द थे राम -राम बस उसी दिन से कबीर जी ने इसे दीक्षा मंत्र मान लिया और रामानन्द जी को अपना गुरु माना कबीर जी पड़े -लिखे नहीं थे उनके शिष्यों ने उनकी वाणी को शब्दों में पिरोया उन्होंने सम्पूर्ण जीवन राम भक्ति को अर्पित की कबीर के राम किसी रूप व कृति तक सिमित नहीं थे वे कर्मकाण्ड के घोर विरोधी थे कबीर हिन्दू -मुस्लमान दोनों को एक ही ईश्वर की संतान समझा उन्होंने पाखंडी ब्रहाम्णो व मोलवियों द्वारा रची गई भ्रांतियों व पाखंडो पर अपनी वाणी से कठोर प्रहार लगातार किया वे मूर्ति -पूजा अवतार ,रोजा ,व्रत आदि को नहीं मानते थे उन्होंने हिन्दू -मुस्लिम के द्वेष की खाई को पाठने की सदैव कोशिश की उनके शिष्यों ने उनके वचनो को ग्रंथ का रूप दिया जो की बीजक है इनकी भाषा साधुक्की खिचड़ी है इनकी सरल व सहज भाषा के कारण ही आम आदमी तक उनके विचार आसानी से पहुंच जाते थे उनके विचारो का प्रमुख विषय समाज कुरीतियों व आंडम्बरो पर प्रहार व भक्ति रहा उनका मानना था कि भक्ति के लिए मंदिर व मस्जित की आवश्यकता नहीं है बल्कि ईश्वर प्रत्येक प्राणी के मन में वास करते है कबीर जी ने अपने अंतिम यात्रा तक लोगो की कुरीतियों ,अंधविश्वासो आडंबरो से बाहर निकालने का प्रयास किया वे अपने अंतिम दिनों में मगहर चले गए चूँकि उस समय यह धारणा थी कि काशी में मरने पर स्वर्ग व मगहर में मरने पर नरक मिलता है कबीर जानबुझकर मगहर गए क्योंकि वे मानते थे मनुष्य को गति स्थान के अनुसार नहीं बल्कि कर्म अनुसार मिलती है संतो की विशिष्टपरम्परा में कबीर जी जाज्वल्यमान नक्षत्रा की भांति चमक रहे है
सचिन कुमार सेवक
sachinkr4777@gmail.comSachin Kumar Sewak

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