यूं हीं नहीं शामिल किया जाता मायावती का नाम बड़े नेताओं में

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दिल्ली /लखनऊ समाचार*
2007 में जब मायावती ने देश के सबसे बड़े सूबे पर बहुमत की सरकार बनाई तो विश्व जगत में उनकी जीत को बराक ओबामा की तरह एक दलित शोषित और सदियों के उत्पीड़न के विरुद्ध क्रांति समझा गया ,
मायावती पर दुनिया भर में रिसर्च प्रारम्भ हो गयी , अपनी आत्ममुग्धता अहंकार और चाटुकारो के कारण सत्ता उनसे दूर चली गई ,अखिलेश यादव एक बड़ी उम्मीद बनकर उभरे और आप ध्यान से देखेंगे तो पाएंगे कि दोनों की हार के कारको में एक ही प्रकार के षंड्यंत्र था , आज जब मायावती ने राज्यसभा से इस्तीफा दिया तो इसे समझना भारत के हर दबे ,कुचले ,शोषित ,पिछड़े और असहाय समाज के लिए समझना जरूरी है
 मायावती का उभार उच्च वर्ग से नफरत के  आधार पर हुआ ,उनका ‘ तिलक तराजू और तलवार इनके मारो जूते चार ‘ जैसा नारा उनके समाज के लिए एक चमत्कार था उनके सदियों के उत्पीड़न के जवाब में कोई देवी आयी थी और उनके समाज की बॉडी लेंग्वेज बदल गई ,हर बार जब वो मुख्यमंत्री बनी , उनका समाज बेहतर होता गया , सत्ता तक पहुंचने के लिए माया ने हर सहारा लिया ,मगर अपनी नीति में कोई बदलाव नही किया ,एक बार छह -छह महीने की सरकार तय हुई ,अपने छह महीने पुरे कर दूसरे दल की नीयत में खोट देखा तो लात मार दी ,
2007 में मायावती में बदलाव आया ,उनकी महत्वकांक्षा बढ़ गयी, या योजनाबद्ध तरीके से उनके इर्द गिर्द ऐसे लोगो को खड़ा कर दिया गया जो उनको सर्वशक्तिमान बताने लगे , जैसे 2017 में अखिलेश के साथ हुआ ,इन दोनों के विरुद्ध एक चक्रव्यूह रचा गया , जिसमे दोनों हार गए ,
2012 से जितना गिराव बसपा की राजनीति में आया है उतना किसी दल में नही आया , मायावती ने जनता के बीच जाना बंद कर दिया , 2007 में 207 विधानसभा सीट वाली बसपा 2007 में 19 सीटो पर आ गयी , यह इतिहास है , अनुभव यह है कि दलित समाज के अलावा आप किसी से भी बात कीजिये वो सबसे ज्यादा नफरत मायावती से करता है किसी दूसरे नेता के लिए इतनी नफरत नही है
मायावती के पक्ष में आप कितनी भी दलील दीजिये ,उनके काम की कितनी भी तारीफ  कीजिये ,आप उनकी कानून व्यवस्था के कैसे भी प्रशंशक हो ,मगर उनकी जाति के अलावा सब और उनके आलोचक ही मिलेंगे ,
ख़ास तौर पर मीडिया जहाँ दलित पत्रकार ना के बराबर है वहां उन्हें सिर्फ हिकारत की नजर से देखा जाता है , इसकी बानगी अंसारी बंधू के बसपा में शामिल होने पर उनके निवास पर देखी जा सकती थी ,जहाँ पत्रकारों ने उनपर कव्वो के झुंड की तरह सवालो से हमला कर दिया था जिसका मायावती ने माकूल जवाब दिया
मायावती की ताकत नफरत से पनपती है उनका वुजूद ऊँची जाति की नफरत से पैदा हुआ ,यहीं ऊँची जाति के लोग जब उनके इर्द गिर्द दिखने लगे तो उनका समाज छिटक गया , फैसला लेने की क्षमता ,दृढ़ प्रशासानिक नेतृत्व ,कानून व्यवस्था पर बेहतरीन पकड़ वाली मायावती से  अफसरों की पिंडली काँपने लगती है , सिर्फ उनके राज में ही रात में 12 बजे डीएम जागकर बिजनोर में  पुलिया बनवाता है
इतनी ताक़तवर मायावती इतनी असहाय कैसे हो गयी कि वो अपनी बात तक नही कह पा रही , मायावती ने आज इस्तीफा दे दिया ,यह स्वीकार होना मुश्किल है , दरअसल मुश्किल में सिर्फ मायावती का कैरियर नही है ,दलितो का अस्तित्व है ,
मायावती यह बात समझ गयी हैं कि काशीराम की नेक कमाई अब लूटने वाली है , पिछले 30 सालों में गुलामी से आज़ादी की और बढ़ा दलित अब फिर गुलामी की और है , मायावती ने अपने इस्तीफा के कारणों के पीछे जिस सहरानपुर का हवाला दिया ,
दलितो के समझने के लिए वो सबसे सटीक वजह है , मायावती ने कहा कि वहां दलितो पर अत्याचार हुआ और उन्हें उनकी बात कहने भी नही दिया जा रहा यह अत्याचार पर अत्यचार है इसलिए वो सदन से इस्तीफा देती है यहाँ पर सहरानपुर को थोड़ा सा समझना पड़ेगा
यहाँ भीम आर्मी ने दलितो के लिए लड़ाई लड़ी और अब उसका मानमर्दन हो चूका है , उसके चीफ चन्द्रशेखर आज़ाद समेत सभी बड़े नेता जेल में है ,भीम आर्मी का नेटवर्क तबाह हो चूका है , दलित हतोउत्साहित है ,जिग्नेश मेवाणी ,नवाब सतपाल तंवर जैसे लोग पानी में हथेली मार रहे हैं , मायावती से दलितो की उम्मीद टूट रही है , मायावती घनघोर हताशा में है , राज्यसभा से इस्तीफा मायावती की लड़ाई प्रारम्भ है ,
अब मायावती अपनी आखरी लड़ाई लड़ना चाहती है ,मुश्किल में घिर आये अपने समाज के लिए वो अपने तेवर को 30 साल फ़्लेसबेक में ले जाना चाहती है , यह माया की आखरी लड़ाई है ,यहाँ से उनके राजनितिक जीवन पर ही प्रश्नचिन्ह नही लगेगा  अपितु उनका समाज भी गुलामी की और चला जायेगा।

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