माता छिन्नमस्तिका का मुख्य मंदिर – शक्तिपीठ 

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भारत के झारखंड राज्य में रांची से लगभग 75  किमी की दूरी पर भैरवी नदी और दामोदर के संगम पर रामगढ़ जिले में रजरप्पा जगह है, वही है मुख्य शक्तिपीठो में से एक माता छिन्नमस्तिका का मंदिर  |
 यह तांत्रिक पीठ है और माँ कामख्या तारापीठ की तरह तांत्रिकों का धाम है देवी माँ के भक्तों का मुख्य आस्था का केंद्र जहां हर नवरात्री भक्तों के अलावा यहां सूर्य , हनुमान शिव आदि भगवानो के दस मंदिर और भी हैं | यह मंदिर बहुत पुराना है और इसकी जानकारी वेदों पुराणों में भी मिलती है | दुर्गा सप्तशती में इस मंदिर की बात की गई है |
आज भी बलि लगती है जानवरों की 
इस मंदिर में काली पूजा, मंगलवार और शनिवार को बकरों की बलि चढ़ाई जाती है बलि के बाद सर पुजारी ले जाता है और धड़ बलि के दौरान जो खून निकलता है उस पर मक्खी नहीं बैठती |
माँ छिन्नमस्तिका की उतपत्ति की कथा
एक बार भगवती माँ अपनी दो सहचरियों के साथ नदी में स्नान कर  रही थी | स्नान करते करते उनकी दोनों सहचरियों को भूख लगने लगी | भूख के कारण उनके चेहरे का रंग उड़ चुका था | उन दोनों ने माँ भगवती से उनकी भूख को शांत करने की विनती की | माँ भगवती से उनकी यह हालत देखी नहीं जा रही थी |
आस पास खाने पीने की भी कोई व्यवस्था नहीं थी बस माँ का कलेजा भर गया | उन्होंने अपने शीश को तलवार से काट दिया और गर्दन के दोनों  ओर खून की धार बहने लगी  माँ ने इन धारों से उन दोनों की भूख  को शांत किया | एक तीसरी धार को माँ ने स्वयं पान किया |
अतः माँ अपने भक्तों में अति प्रिय हो गई | जो दिल से माँ से कुछ मांगते है माँ उनके प्यार के लिए अपना शीश भी काट लेती है और अपना लहू पीला कर भी उनकी विनती पूरी करती है

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