नितीश भी नहीं है महागठबंधन से दूर

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मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के तीखे तेवर को लेकर लोगों के जेहन में यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर वो चाहते क्या हैं? लेकिन इतना तय है कि नीतीश महागठबंधन नहीं छोड़ेंगे।
ख़ास बात ये है कि नीतीश कुमार के कुछ बयानों से इन अटकलों को हवा मिलना लाजिमी है। पहले उन्होंने महागठबंधन के सहयोगी दल लालू प्रसाद यादव के राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस पार्टी से इतर जाकर नोटबंदी का समर्थन किया, जिसके बाद बवाल मचा और ये मामला कुछ दिनों तक जोर-शोर से चला कि नीतीश कुमार को पीएम मोदी पसंद आ रहे।
नीतीश अगर पाला बदलकर भी बहुमत जुटा लेंगे, उनके अपने 71 विधायक हैं और राज्य में भारतीय जनता पार्टी के 53 विधायक। लेकिन राजनीति केवल गणित से नहीं चलती, यही वजह है कि नीतीश कुमार गठबंधन से अलग नहीं हो सकते, किसी जल्दबाजी में तो बिलकुल नहीं और पार्टी के वरिष्ठ नेता केसी त्यागी ने कहा है कि गठबंधन तो साल 2025 तक भी चल सकता है।
अब अगर वे महज तीन साल के अंदर फिर से पाला बदलेंगे तो उनकी राजनीतिक छवि को नुकसान ज्यादा होगा। उनकी विश्वसनीयता कम होगी, नीतीश जैसा मंझा हुआ नेता कभी ये नहीं चाहेगा कि छवि का नुकसान हो।
ऐसे में सवाल ये है कि नीतीश कुमार बार-बार महागठबंधन के अस्तित्व को चुनौती क्यों देते रहते हैं। इसकी वजह तो यही है कि वे संदेश देना चाहते हैं कि बिहार में सरकार के मुखिया वही हैं। नीतीश अपने लोगों के साथ-साथ विपक्ष के लोगों को भी बताना चाहते हैं कि सरकार वही चला रहे हैं।
इसके अलावा लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार के सदस्यों पर बेनामी संपत्ति जमा करने के आरोप सामने आए हैं, जांच एजेंसियां इन मामलों की जांच भी कर रही है। ऐसे में नीतीश कुमार को अपनी सुशासन कुमार वाली छवि को बनाए रखना भी ज़रूरी है और और वे लालू प्रसाद ब्रिगेड को बेलगाम होने भी नहीं देते।
jn

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