जैसी करनी वैसी भरनी – Jaisi Karni Waisi Bharni

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अजीब है नजारा इस बदलती दुनीयाँका…
   लोग सबकुछ बटोरते है खाली हाथ जानेके लिए…!’
 हम लोग कई दिनो से अध्यात्मीक चर्चा कर रहे है…!
अध्यात्मका मतलब भगवानका ‘पोस्टमार्टेम’ करनाही नहीं है…
अध्यात्मका सिधा अर्थ हमारा खुद का और हमारी प्रवृत्तीका ‘पोस्टमार्टेम’ करनाही होता है…!
मेरी कथाओमें पौराणिक बाते बहुतही कम आयेगी…! जब बिमारीही कलियुग की है, तो दवाईयाँ सत्य युग और द्वापार युगकी कैसी चलेगी…!
भगवान के अवतार आये, संत आये, उनका सत्कर्म और कार्य करके नीकल गये…!
बाद मे किसी के सपने में भी जल्दी आये नहीं…!
और हम लोग सदियों तक उनकी सी.बी.आय. इन्कॉयरी करते रहे…!
बस जहाँ पर कुछ चमत्कारों की बात सुनाई पडी, कामधंदा छोडकर भागते रहे…!
लेकिन चिटींग तो मंदिर-मस्जीदोंमे जाकर भी छोडते नहीं…!
वहाँ पर बैठे ठेकेदार भी उसी काम मे लगे हुये है…!
सब अपने आपको भगवान के सामने जाकर चमकाने लगे है…!
भगवान के सामने हम लोग बडेही विनम्रता के साथ हाथ जोडकर भोले बनकर हमारी अर्जीयाँ पेश करते है…!
  ” हे प्रभू … हे परमात्मा… सब कुछ तेरी ही दयासे ठिक चल रहा है…!
आगे भी ऐसा ही चलाना मालिक… तेरी किरपा बनाएं रखना…!”
  आँखे बंद कर-करके आरती में तालीयाँ भी बजाई…
  ‘ तेरा तुझको अरपन् … तेरा तुझको अरपन्…
            क्या लागे मेरा…!
  पुरी आरती बडेही भाव सें हम लोग गाते है…
मन प्रसन्न हुवा… अब आरती की थाली सामने आने वाली है…
अब हम लोग जेब में हाथ डालकर सिक्का टटोलकर देखने वाले है…!
  ‘ ये थोडा मोटा लगा… पाँच का होगा…!’
  ‘ अरे ये भी बडा लगा… दो का होगा…!’
  ‘तिसरा थोडा सा छोटा लगा… हाँ… अब सही है…
एक का होगा…! गब्बरसींग… अब आयेगा खेल का मजा…!’
   [ ‘बहुत याराना लगता है… भगवान से नहीं… पैसो सें…!’ ]
 ‘ तेरा तुझको अरपन् … क्या लागे मेरा…?’
  फिर भगवान सोचता होगा…
  ‘ अरे बदमाश… सब कुछ तो तेरा ही था…
मेरा तो सिर्फ एक रूपिया ही था…!
चलने दे… अब तु तेरे ही तरीके से चलने दे…
लेकिन याद रखना… जीस दिन मै मेरे तरीके से चलाउँगा ना…?
तु पुरी आरती भुल जायेगा…!”
ऐसा ही होता है ना…? या कुछ गलत कहां मैने…?
 हमारे कथा-सत्संग में यही तो ‘पोस्टमार्टेम’ होता है…!
भगवान के सामने भी हम लोग खुद कहां होते है…?
वहाँ पर हमारे गुन और अवगुन हमारा प्रतिनिधित्व करते है…!
अनेक लोग बडेही सज्जन और सद्गुणी होते है, जीनका परमात्मा के प्रति पुरा समर्पण होता है…!
फिर भी… भगवानके साथ और ओ भी उसकेही घरमे बदमाशी करनेवालोंकी कोई कमी नहीं है…!  भगवान के दरबार में गये… दस रूपिये की चार नोट जेब में है…
तिन नोटे बिलकुल नई नवेली बंडल से नीकली हुई बिलकुल फ्रेश और गरमागरम है…!
एक दम ताजा माल…! और एक नोट बिलकुल घिसी-पिटी और मुरझाई हुई शोलेके इमाम हंगल साहब के जेब से गीरी हुई आपके पास आयी है…!
भगवान के दान पात्र में आपको दस रूपिया डालने की इच्छा हो गई है…
अब आप कौन सी नोट डालेंगे…?
  सोचो…! सोचकर डालना…! कही गडबड ना हो जाये…!  अगर घाटेका सौदा हुवा तो भगवान नाराज होगा…! बताओ… कौन सी नोट डालेंगे…?
    ‘ पुरानी ही ना…?’
 बिलकुल सही काम किया आपने…!
भगवान को नयी नोटों की अॕलर्जी है…!’
        OLD IS GOLD
  भगवान चक्कर आते आते बच गये… इतना हम लोग उसको चक्कर मे डालते है…!
  ‘ वक्त ने तराशा बहोत, कि हिरा बन जाउँ…
  हम कोयला बने रहे, बिक जाने के खौफ़ से…!’
  यहीं तो हकीकत है… यही हमारा ‘पोस्टमार्टेम’ है…!
  पुरानी दस रूपिये की नोट दानपात्र में डालकर मंदिर से बाहर नीकलते है…! और आजही किसी दानशूर व्यक्ती के जनम दिन पर मंदिर के बाहर लड्डू बाँटने का काम हो रहा है… हम लोग भी कतार में है… और गलती से हमारे हाथ में थोडा छोटा लड्डू आयेगा तो…?
  हम बाकी लोगों के हाथ पर ध्यान से देखेंगे… और मन ही मन सोचेंगे…!
  ‘ यार… मुझे ही छोटा लड्डू क्यूँ आ गया…?’
  अब सोचो… पुरानी नोट देना यदी हम जानते है…
तो छोटा लड्डू देना ओ भी जानता है…! दोस्तो… हमेशा दिल बडा रखना…!
भगवान के दरबार में अगर हम लोग इतनी गडबड करते है, तो बाहर कितनी करते होंगे…? गडबड करने से ही पुरी गडबड हो जाती है…! जींदगी में हमेशा अच्छा काम करो, अच्छी सोच रखो…! बिलकुल साधूता हमारे अंदर होनी चाहिये…!
  ‘ ना मांझी, ना रहेब़र… ना हक् में हवा है…
  है कश्तीयाँ भी जर्जर, ये कैसा सफर है…?
  अलगही मजा है मेरा फकिरीका अपना…
   ना पानेकी कोई चिंता, ना खोनेका डर है…!’
BHAU-THORTAH
    भाऊ थोरात शिरडी

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