गरीब लोगो की मदद करने का महीना है रमजान 

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रमजान का माह गरीब लोगो की मदद करने का महीना होता है खुदा का हुक्म है की रोजेदार अपनी हैसियत के अनुसार इस महीने में गरीब लोगो की ज्यादा मदद करे रोजा सिर्फ भूखे रहने का नाम नहीं है बल्कि गरीबो से हमदर्दी का नाम है रोजेदार तब तक अपना रोजा इफ्तार नहीं कर सकता जब तक वह यह न देख ले की उसके पड़ोसी के घर में खाने के लिए कुछ है भी या नहीं अगर नहीं है तो उसका फर्ज बनता है की पहले उसे खाना दे बाद में खुद खाए रोजा इंसान को एक अच्छा इंसान बनाता है इंसानियत का पता तब चलता है जब पेट भूखा हो रमजान में रोजेदार से खुदा कोई हिसाब – किताब नहीं लेता रोजेदार जमकर गरीबो पर पैसा खर्च कर सकता है जिस व्यक्ति के पास माल -ए- हैसियत होती है उसे जकात देनी होती है यह एक तरीके से टैक्स होता है अमीर वर्ग के ऊपर जो गरीब लोगो को दिया जाता है एक रोजेदार को भूखे रहने के साथ अपनी आँख ,कान ,नाक ,मुँह,का भी रोजा रखना पड़ता है अगर रोजे की हालत में रोजेदार के मुँह से किसी व्यक्ति के लिए कुछ गलत बात निकल गई तो उसका रोजा खुदा की बारगाह में कुबूल नहीं होगा रोजा अच्छा काम करने के लिए प्रेरित करता है अगर किसी रोजेदार को लगता है की वह रोजा रखकर भी गलत काम कर रहा है तो फिर उसका रोजा नहीं माना जाएगा रोजेदार के लिए झूठ बोलना हराम होता है रोजा अक़ीदा है खुदा के हुक्म को मानने का जो लोग यह मानते है की रोजा सिर्फ भूखे रहने का नाम है तो वह गलत सोच रखते है बच्चे औरत और पुरुष सभी के लिए रोजा रखना हमारा फर्ज है l

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